Friday, 2 October 2026

न्यूज1;उत्तर प्रदेश पुलिस की जांच प्रक्रिया पर सुप्रीम कोर्ट ने बुधवार को बेहद कड़ी टिप्पणी की/news 2:पहले वाटर फिल्टर आया.. ये कह के कि आपको बैक्टीरिया और बाकी बीमारियों से बचाएगा..


उत्तर प्रदेश पुलिस की जांच प्रक्रिया पर सुप्रीम कोर्ट ने बुधवार को बेहद कड़ी टिप्पणी की। एक मामले की सुनवाई के दौरान कोर्ट ने जांच की निष्पक्षता पर सवाल उठाते हुए कहा कि अगर पुलिस के हर कदम में कोई न कोई एजेंडा नजर आएगा तो लोग उस पर भरोसा कैसे करेंगे।

सुनवाई के दौरान जस्टिस संजय कुमार और जस्टिस संजीव सचदेवा की पीठ ने यहां तक कह दिया कि ऐसी स्थिति में बेहतर होगा कि उत्तर प्रदेश पुलिस से जुड़े सभी मामलों की जांच केंद्रीय जांच ब्यूरो (CBI) को सौंप दी जाए और उत्तर प्रदेश पुलिस को ही भंग कर दिया जाए। पीठ ने जांच में गंभीर अनियमितताओं को लेकर नाराजगी जताई।

दरअसल मामला एक मोटरसाइकिल सवार से जुड़ा है, जिसे शिकायतकर्ता ने कथित तौर पर मौके पर ही पकड़कर स्थानीय पुलिस के हवाले कर दिया था। इसके बावजूद पुलिस ने एफआईआर एक ‘अज्ञात’ मोटरसाइकिल सवार के खिलाफ दर्ज की।

बार एंड बेंच की रिपोर्ट के मुताबिक, शिकायतकर्ता ने सुप्रीम कोर्ट को बताया कि मोटरसाइकिल से जुड़ी घटना के बाद उसने सवार को खुद पकड़ लिया था और पुलिस के हवाले कर दिया था। इसके बावजूद पुलिस ने एफआईआर में आरोपी का नाम दर्ज नहीं किया और उसे ‘अज्ञात’ बताया। याचिकाकर्ता के मुताबिक, आरोपी वाले कॉलम को भी खाली रखा गया था। मामले में हाई कोर्ट के हस्तक्षेप और स्टेटस रिपोर्ट मांगे जाने के बाद पुलिस ने चार्जशीट में मोटरसाइकिल सवार का नाम शामिल किया। हालांकि, बाद में उसे क्लीन चिट दे दी गई।
याचिकाकर्ता ने जांच के दौरान मोटरसाइकिल से जुड़ी एक और बात कोर्ट के सामने रखी। उसके मुताबिक, जब मोटरसाइकिल जब्त की गई थी, तब उस पर नंबर प्लेट नहीं थी। लेकिन जांच के दौरान उसे एक रजिस्ट्रेशन नंबर दे दिया गया। इन परिस्थितियों को लेकर सुप्रीम कोर्ट ने यूपी पुलिस की जांच के तरीके पर गंभीर सवाल उठाए।

पीठ ने उत्तर प्रदेश पुलिस की ओर से पेश वकील से सवाल किया कि जब व्यक्ति को मौके पर ही पकड़ लिया गया था तो एफआईआर में उसे अज्ञात क्यों बताया गया। कोर्ट ने पूछा कि अगर पुलिस ने मौके पर ही मोटरसाइकिल सवार को पकड़ लिया था तो उसके खिलाफ ‘अज्ञात’ के नाम से एफआईआर क्यों दर्ज की गई? पीठ ने कहा कि ऐसी स्थिति में पुलिस पर लोगों का भरोसा कैसे रहेगा।
सुप्रीम कोर्ट ने कहा कि किसी ऐसे व्यक्ति का नाम शुरुआती एफआईआर में खाली छोड़ देना, जिसे मौके पर पकड़ा गया हो, और बाद में मामले की जानकारी में बदलाव करना पुलिस और कानून लागू करने वाली संस्थाओं की विश्वसनीयता को नुकसान पहुंचाता है।
सुनवाई के दौरान पीठ ने पुलिस की कार्यप्रणाली पर तीखी टिप्पणी की। कोर्ट ने कहा कि अगर इसी तरह मामलों को आगे बढ़ाया जाएगा तो लोग पुलिस पर भरोसा कैसे करेंगे। पीठ ने यह भी कहा कि बेहतर होगा कि CBI को उत्तर प्रदेश पुलिस की सभी जांचों में हस्तक्षेप करने के लिए कहा जाए।

सुप्रीम कोर्ट ने मौखिक रूप से कहा: ‘हम यूपी पुलिस को भंग ही कर दें। यह बकवास किसी न किसी स्तर पर बंद होनी चाहिए।’ पीठ ने जांच को लेकर यह भी कहा कि पुलिस का किसी दिशा में चलना एक बात है, लेकिन इस तरह जरूरत से ज्यादा किसी पक्ष को फायदा पहुंचाने की कोशिश और ‘कवर-अप’ करना अलग बात है।




पहले वाटर फिल्टर आया.. ये कह के कि आपको बैक्टीरिया और बाकी बीमारियों से बचाएगा.. 

फिर RO आया..  ये कहा गया कि जो वायरस और बैक्टीरिया फिल्टर से नहीं छन पाते हैं और बच जाते हैं उन्हें ये छान लेगा.. 

फिर RO में UV और एक और मेंब्रेन लग के आने लगी, और ये बताया गया कि पहले वाले से भी जो वायरस बच जाते थे उन्हें UV अब डीएक्टिवेट कर देगा

फिर सालों बाद इन्हीं कंपनियों को पता चला कि जिस पानी को इन्होंने इतना छान दिया था उसे दरअसल इतना छानने की ज़रूरत नहीं थी..

क्योंकि ये "अत्यधिक छना" पानी अब असल पानी से कहीं ज़्यादा नुकसानदेह है.. 

फिर कंपनियां "एल्कलाइन वाटर" ले कर आईं.. 

एल्कलाइन फिल्टर वाली बॉटल आईं और अब एल्कलाइन फिल्टर भी आ गए हैं.. 

अब उसी छाने हुवे पानी में फिर से मिनरल मिलाया जाता है

फिर Kangen वाटर आया.. काला एल्कलाइन पानी आया.. 

अब ये बताया जा रहा है कि ज्यादा फिल्टर का पानी दरअसल सबसे ज़्यादा नुकसानदेह होता है.. 

अगर आप कम TDS वाला पानी, जो कि RO का या बिसलेरी की बॉटल का होता है, वो अगर आप रोज़ पीते हैं तो धीरे धीरे वो आपकी हड्डियां, दांत सब गलाने लगता है और आपके हृदय की धमनिया वगैरह ख़राब होनी शुरू हो जाती हैं..

 कंपनियां जो RO बेच रही हैं वो इसे नहीं बताती हैं

अब WHO यानि वर्ल्ड हेल्थ ऑर्गेनाइजेशन कहता है कि किसी भी पानी जिसका TDS 100 से कम है वो आपके लिए नुकसान दायक होता है और बिसलेरी का TDS 30 se 75 के बीच होता है..

 आपके घर में जो RO लगा है अगर उसका TDS 35 या 75 है तो समझिए आप ज़हर पी रहे हैं पानी नहीं..

समस्या ये है कि अब शहरों का पानी बहुत अधिक प्रदूषित हो चुका है.. 

आप शहरों में अब सीधे नल का पानी नहीं पी सकते हैं.. क्यूंकि आपके नल के आसपास जाने कितने टॉयलेट के गढ्ढे होंगे.. 

आपको फिल्टर तो चाहिए मगर फिल्टर क्या क्या छान ले रहा है आपके पानी से ये आप जान नहीं पाते हैं.. 

फिल्टर वाली कंपनियों का कोई भी एम्प्लॉय न तो ये जानता है और न ही आपको बताता है क्योंकि उसे बस अपना माल बेचना होता है.. 

आपके दांत गल जाएं या हृदय की धमनियां, उसे इस से कोई फ़र्क नहीं पड़ता है.. 

चूंकि ये RO भी मेडिकल की ही तरह बहुत बड़ा बिज़नेस बन चुका है इसलिए अब कोई भी आपको फिल्टर के साइड इफेक्ट बताता ही नहीं है

अब पानी छानिये.. फिर उसे एल्कलाइन बनाईये.. फिर उसमे मिनरल ऐड कीजिये.. फिर पीजिये.. 

मगर ये वाटर फ़िल्टर की कंपनियां आपके घर के हिसाब से कोई ऐसा फ़िल्टर नहीं लगाएंगी जो वहां सिर्फ़ वही ज़रूरत पूरी करे जो होनी चाहिए..

 ज़्यादातर घरों में जो पानी आता है उनमे से TDS कम करने की कोई ज़रूरत नहीं होती है.. 

मगर कंपनी का एक बिना पढ़ा लिखा एम्प्लोयी आकर आपको 10 फ़िल्टर वाला प्रोडक्ट बेच देता है और आपके पानी में कुछ बचता ही नहीं जिसकी आपके शरीर को ज़रूरत होती है.. 

फिर आप डॉक्टर के पास जाते हैं और डॉक्टर आपको विटामिन और मिनरल्स की गोलियां खिलाता है ..

ये गोल गोल घेरा है.. सबका बिज़नस चल रहा है और सबको बस बिज़नस चलाना है.. एक आपको पानी छान के पिलाता है.. 

दूसरा आपको पानी से छाने गए मिनरल को गोली में देता है.. मगर कोई आपको असल बिमारी कभी नहीं बताता है l

अतः जिस तरह आप ब्लड टेस्ट व इन्वेस्टिगेशन के बाद दवा लेते है, उसी तरह पहले पानी का टेस्ट करे, फिर उसी के हिसाब से Customised RO लगवाए l

आज प्रिंट इलेक्ट्रानिक मीडिया टेलीविजन रेडियो सब जगह यह सुनते-सुनते ऊब गया कि कृतज्ञ राष्ट्र आज गांधी जी की जयंती मना रहा है फिर मैंने सोचा चलो मैं भी गांधी जी के प्रति अपनी कृतज्ञता व्यक्त कर दूं और कृतज्ञता मानना भी चाहिए क्योंकि गांधी जी ने बहुत से बड़े-बड़े काम कर डाले हैं -

आज प्रिंट इलेक्ट्रानिक मीडिया टेलीविजन रेडियो सब जगह यह सुनते-सुनते ऊब गया कि कृतज्ञ राष्ट्र आज गांधी जी की जयंती मना रहा है फिर मैंने सोचा चलो मैं भी गांधी जी के प्रति अपनी कृतज्ञता व्यक्त कर दूं और कृतज्ञता मानना भी चाहिए क्योंकि गांधी जी ने बहुत से बड़े-बड़े काम कर डाले हैं - 

जैसे कि पहले काम उन्होंने यह किया की संपूर्ण भारत के सनातनी समाज के उल्टे गाय की जगह बकरी को पालन शुरू कर दिया था दूसरा उन्होंने कहा था पाकिस्तान मेरी लाश पर बनेगा इसलिए पाकिस्तान नहीं बन पाया 90 लाख गैर मुसलमान एक झटके में हलाल हो गए 

तीसरा उन्होंने एक गाना गया ईश्वर अल्लाह तेरो नाम लेकिन कहीं भी अल्लाह वालों ने ईश्वर को अपने मजहब के स्थान में आज तक स्थान नहीं दिया नमाज तो गांधी जी ने मंदिरों और धर्म स्थान में पढ़ा दिया लेकिन किसी भी मस्जिद में या मदरसा या इमामबाड़ा में आज तक कहीं भी कीर्तन भजन अखंड रामायण जैसे काम नहीं हुए गांधी जी ने दुनिया के सबसे योग्य नेता नेहरू को जबरदस्ती सबके ऊपर होकर प्रधानमंत्री बनाया इसके अलावा गांधी ने सोंटी धोती और लंगोटी का प्रयोग करते हुए हाहाकार मचा दिया  सत्य और अहिंसा का ऐसा हाहाकारी प्रयोग किया कि चीन पाकिस्तान ने भारत का लाखों वर्ग किलोमीटर एक ही झटके में छीन लिया

 भारत की सेना को चाहिए था कि वह गांधी जी का चरखा और बकरी लेकर धोती और लंगोटी पहनकर सोंटी लेकर चीन पाकिस्तान का मुकाबला करते तो भारत जीत गया होता या फिर तीन बंदरों को ले जाना चाहिए था इसके अलावा मेरे सत्य के प्रति प्रयोग में तो उन्होंने ऐसा प्रयोग किया है कि सारे संसार में उनके जय-जय कर हो रही है इतना ही नहीं आज गांधी छाप नोट के बिना और हर कार्यालय में अपने पीछे उनकी फोटो लगाए बिना कोई काम संभव ही नहीं है उन्होंने कस्तूरबा को संभोग से मना करते हुए एवं सुख न लेने की प्रतिज्ञा किया और इसी रास्ते पर चलते हुए उनका पोता हरी लाल मुसलमान बनकर अपनी ही बेटी से विवाह कर लिया ढाका से लेकर लाहौर तक एक स्वतंत्र गलियारा भी देने का प्रयास किया था लेकिन नाथूराम गोडसे के कारण सफल नहीं हो पाया और भी अनेक बड़े-बड़े काम किया तभी तो आज राष्ट्रपिता की पदवी पाए और छोटे-मोटे तो छोड़ दो कांग्रेस भाजपा सहित सारे दल गांधी के पीछे-पीछे चलकर अपनी कृतज्ञता व्यक्त कर रहे हैं तो हम आप किस खेत की मूली हैं और गांधी जयंती के चक्कर में शास्त्री जी को बुलाने का पूरा प्रयास भी हो रहा है जो वास्तविक भारत रत्न और सभी राजनेताओं में सबसे बड़े सपूत थे हे गांधी तभी तो सारे राजनेता मंत्री सांसद विधायक सरकारी कर्मचारी और अधिकारी धन कुबेर आपकी हर चीज और सिद्धांत अपना कर अपने बच्चों को गांधी बन रहे हैं और सारे देश के बच्चे गांधी बन चुके हैं जो गांधी जी की अपार लोकप्रियता और राष्ट्रपिता होने का प्रमाण है और आज तक भगवान राम कृष्णा गौतम बुद्ध महावीर स्वामी ईसा मसीह पैगंबर मोहम्मद के भी करने पर महाकाल राय नहीं लेकिन गांधी की चिता जली तो महाकाल प्रकट होकर सबके सामने रोया था प्रमाण में यह कविता है-

 जिस दिन तेरी चिता जली 

रोया था महाकाल 

साबरमती के संत 

तूने कर दिया कमाल - डॉ दिलीप कुमार सिंह मौसम विज्ञानी ज्योतिष शिरोमणि एवं निदेशक अलका शिप्रा वैष्णवी ज्योतिष मौसम पूर्वानुमान और विज्ञान अनुसंधान केंद्र जौनपुर 7017713978

खबर का असर : वन विभाग ने सरवा नर्सरी पर पहुचाई

खबर का असर : वन विभाग ने सरवा नर्सरी पर पहुचाई लकडी
राकेश मौर्य 
जिला संवाददाता 

लखीमपुर खीरी। खीरी जनपद की शारदानगर रेंज में वन विभाग के अफसरो के काले कारनामों का सच उजागर हो गया है। आंधी में गिरे पेड़ों की लकड़ी गायब होने की खबर अखबारों में प्रमुखता से प्रकाशित होने के बाद वन विभाग बैकफुट पर नजर आ रहा है। वन विभाग के अफसरो ने छीछालेदारी से बचने के लिए आंधी में गिरे पेड़ों की कुछ लकडी सरवा नर्सरी पर पहुंचा दी है। हालांकि सरवा नर्सरी पर पहुची लकडी नाममात्र की ही है, शेष लकडी को डिप्टी रेंजर संजय आजाद ने पहले ही भिम्मापुरवा के लकडकट्टे विक्रम के हाथों बेच दिया था। लेकिन वन विभाग के इस काले कारनामों की खबरें जब अखबारों की सुर्खियां बन गई तो वन विभाग के अफसर खुद को बचाने में जुट गए। 

जानकारी के मुताबिक दक्षिण खीरी वन प्रभाग की शारदानगर रेंज में बीते दिनों आई तेज रफ्तार बारिश व आंधी में सडक किनारे लगे अर्जुन, जंगल जलेबी व अन्य प्रजाति के सरकारी पेड़ धराशाई हो गए थे। इस आंधी में टेढुई पुलिया से फूलबेहड़ व सरवा जाने वाले मार्ग पर सबसे अधिक पेड धराशाई हुए थे। जिसके चलते वन विभाग ने इन गिरे हुए पेड़ों को हटवाने की जिम्मेदारी क्षेत्रीय वन दरोगा व डिप्टी रेंजर संजय आजाद को सौपी गई थी। डिप्टी रेंजर संजय आजाद ने क्षेत्र के ही भिम्मापुरवा गांव के लकडकट्टे विक्रम से सांठगांठ कर अपना खेल खेल दिया। आरोप है कि डिप्टी रेंजर संजय आजाद ने सडक किनारे गिरे इन पेड़ों को काट कर अवैध रूप से बेंच दिया। जबकि दिखावे को कुछ पेड़ों की मुडढी मय तना मौके पर छोड़ दी। इस मामले को लेकर जब मीडिया में चर्चा हुई तो मीडियाकर्मियों ने लकडी के बारे में जानकारी ली, तो पता चला कि सडक किनारे गिरे पेड़ों की लकड़ी न तो रेंज कार्यालय पहुंची है और न ही तेतारपुर नर्सरी में। तब मीडियाकर्मियों ने डिप्टी रेंजर संजय आजाद को मालुमात के लिए फोन किया तो संजय आजाद ने किसी भी मीडियाकर्मी का फोन नहीं उठाया। बारिश व आंधी में सडक पर गिरे पेड़ों के गायब किए जाने के मामले में दक्षिण खीरी वन प्रभाग के डीएफओ तापस मिहिर के भी सुर बदले नजर आये थे। डीएफओ तापस मिहिर ने भी इस मामले में टालमटोल वाला जवाब देते हुए कहा था कि आपका कोई पर्सनल मामला है क्या, अगर ऐसा है तो व्हाट्सएप पर दे, मै दिखवा लूंगा। यह कह कर डीएफओ ने तापस मिहिर फोन काट दिया था। इस मामले को लेकर दैनिक सद्भावना का प्रतीक अखबार समेत सोशल मीडिया पर खबर प्रमुखता से प्रकाशित की गई। तब वन विभाग के अफसरो ने छीछालेदारी से बचने के लिए आनन फानन में आंधी में गिरे कुछ पेड़ों की लकड़ी को सरवा नर्सरी पर पहुंचा दिया, जिससे यह साबित हो सके कि आंधी में गिरे पेड़ों की लकड़ी सरकारी नर्सरी पर रखी गई है।

अत्यंत कठिन जीवत्पुत्रिका का महाव्रत डॉ दिलीप कुमार सिंह मौसम विज्ञानी ज्योतिष शिरोमणि

अत्यंत कठिन जीवत्पुत्रिका का महाव्रत डॉ दिलीप कुमार सिंह मौसम विज्ञानी ज्योतिष शिरोमणि

यह व्रत क्या है और कौन रहती है 

जीवित्पुत्रिका या जिउतिया का महा व्रत अत्यंत कठिन व्रत होता है इसे क्वार महीने की अष्टमी तिथि कृष्ण पक्ष को मनाया जाता है यह व्रत माताएं अपने पुत्र के दीर्घायु सुख शांति समृद्धि यश कीर्ति के लिए रखती है यह तीन दिनों का व्रत होता है जिसमें मुख्य व्रत दूसरे दिन शुरू होता है जो बिना अन्न जल ग्रहण किया किया जाता है आश्विन महीने के भीषण गर्मी में इस व्रत को रख पाना बहुत ही कठिन होता है इसी से एक नारी और मां की महिमा और महत्व को समझा जा सकता है इस वर्ष या व्रत शनिवार  के दिन पड़ रहा है और अंग्रेजी तिथि 3अक्टूबर है यह 2 अक्टूबर  को ही प्रारंभ हो जाएगा 3अक्टूबर को मुख्य निर्जला व्रत है और 4अक्टूबर को सुबह 7ः15 के बाद इसका पारण है।

व्रत करने का स्थान और विधि 

जिउतिया या जीवित्पुत्रिका का महा व्रत तीन दिनों का होता है पहले दिन अर्थात 13 सितंबर को सात्विक भोजन बनाकर पितरों और पक्षियों को अर्पित किया जाता है और सादा भोजन ही किया जाता है दूसरे दिन अर्थात मुख्य व्रत 3 अक्टूबर को आश्विन कृष्ण पक्ष अष्टमी को रविवार के दिन है जब सूर्योदय से पहले ही स्नान करके निर्जला व्रत प्रारंभ किया जाता है किसी साफ सुथरा स्थान को गोबर और मिट्टी से लीप पोत कर उसके बीच में एक जल का कुंड बनाया जाता है उसमें पानी भरकर भगवान जीमूतवाहन की कुशकी निर्मित एक प्रतिमा बनाई जाती हैं जो जलकुंड के बीच में रखा जाता है उसके अगल-बगल चील और सियारिन की प्रतिमा रखी जाती है उसके बाद सभी बैठकर भगवान  जीमूतवाहन की कथा सुनते हैं। 

जीवित्पुत्रिका व्रत की कथाएं 

इस व्रत में तीन कथाएं कही जाती हैं जो लोक जीवन और पुराणों में वर्णित हैं पहले और मुख्य कथा यह है कि जीमूतवाहन जो गंधर्व राजकुमार थे उनका मन राज पाठ में नहीं रहता था और इधर-उधर ज्ञान की खोज में घूमते रहते थे एक दिन संजोग से वह एक ऐसी जगह पहुंचे जहां पर रोना पीटना मचा हुआ था वहां पूछने पर उन्हें पता चला कि पक्षी राज गरुड़ प्रतिदिन आकर एक नाग को खा लेते हैं संजोग से उस दिन जिस नाग की बारी थी वह अपने घर में अकेला पुत्र था इसलिए उसकी मां जोर-जोर से रो रही उसे आश्वस्त करते हुए जीमूतवाहन ने स्वयं को उसकी जगह भगवान गरुड़ को समर्पित कर दिया जब गरुड़ ने खाने के लिए चोंच मारी और मानव का मांस निकला तब वह नाग की जगह एक पुरुष देखकर आश्चर्यचकित हो गया सारी कथा सुनकर गरुड़ देव प्रसन्न हो गए और वरदान मांगने को कहा इस पर जीमूतवाहन ने सभी नागों को अभय दान मांगा और मरे हुए नागों को जीवित करने की प्रार्थना की और गरुड़ देव ने प्रसन्न होकर वैसा ही किया ऐसा करके जीमूतवाहन अमर हो गए और उन्हें देवता माना जाने लगा माना जाने लगा।

दूसरी कथा चील और सियारिन की है जो एक दूसरे को बहुत मानते थे संजोग से एक बार सियारी लेने जीवित्पुत्रिका व्रत किया लेकिन भूख बर्दाश्त न होने पर चोरी से हड्डियां खाने लगी इसके प्रभाव से उसे अनेक दुख कष्ट उठाने पड़े बाद में उसने जीवित्पुत्रिका व्रत करके पुत्र लाभ प्राप्त किया और अगले जन्म में चील और सियारिन दोनों राजकुमार और मंत्री की पत्नी बनी मंत्री की पत्नी चील को सुंदर स्वस्थ बच्चे होते थे यह देखकर सियारिन ने बच्चों का गला काट दिया और कागज में फेंक दिया लेकिन बच्चों का कुछ भी नहीं हुआ यह देखकर सियारिन ने जेल से क्षमा याचना की और कालांतर में उसके भी बच्चे पैदा हुए।

अगली कथा भगवान श्री कृष्ण से जुड़ी हुई है महाभारत युद्ध के बाद जब शैतान अश्वत्थामा ने उत्तर के गर्भ में ब्रह्मास्त्र चलाकर परीक्षित को मार डाला तब भगवान श्री कृष्ण ने अपने तेज से बालक को जिंदा कर दिया और इस प्रकार उनके जीवित पैदा होने पर अत्यंत प्रसन्नता से जिउतिया पर्व मनाया गया।

वैज्ञानिक एवं व्यावहारिक पक्ष भारत के सभी धर्म दर्शन अध्यात्म एवं लोक व्यवहार के कामों में सर्वश्रेष्ठ वैज्ञानिक पक्ष अवश्य जुड़ा रहता है जीवित्पुत्रिका का व्रत अत्यंत कठिन समय में किया जाता है जो महिलाओं को आपातकाल में किसी भी परिस्थिति में सुरक्षित और जीवित रखने में सहायक सिद्ध होता है जीवन में आने का ऐसी स्थितियां आती है जब महिलाओं को अपने मान सम्मान और अपने सतीत्व की रक्षा के लिए बिना खाए पिए चुपचाप छुपकर एक जगह पड़े रहना पड़ता है आपातकाल युद्ध कल अपराध हत्या लूट बलात्कार और आतंकवादी हमले में महिलाएं सबसे पहले और सबसे आसान शिकार सिद्ध होती है इसलिए उनको अनेक व्रत त्यौहार में इस तरह धर्म अध्यात्म की रक्षा करते हुए अपनी भी रक्षा करने का प्रशिक्षण दिया जाता है सचमुच सनातन धर्म परम अद्भुत और सबसे महान है जिसमें हर व्यक्ति का परमाणु से लेकर ईश्वर का जड़ और चेतन का नदी समुद्र पहाड़ का पूरा-पूरा ध्यान रखते हुए सब की पूजा किया जाता है इसके अलावा ऐसे व्रत जैसे करवा चौथ गणेश चतुर्थी हरितालिका तीज से स्त्रियों का शरीर और उनकी प्रतिरोधक क्षमता दोनों चरम शिखर पर पहुंच जाते हैं और निर्जल व्रत रहने से अनेक शारीरिक क्रियाएं फिर से पूरी ऊर्जा प्राप्त करके आगे बढ़ने लगते हैं और डीएनए आरएनए और कोशिकाएं पुनर्जीवन भी प्राप्त कर लेती है

Wednesday, 30 September 2026

पाक्सो अधिनियम 2012 के तीन दिवसीय कार्यक्रम पर जागरूकता अभियान का तीसरा और अंतिम चरण संपन्न

पाक्सो अधिनियम 2012 के तीन दिवसीय कार्यक्रम पर जागरूकता अभियान का तीसरा और अंतिम चरण संपन्न 
आज दिनांक 30/9/2026 को एक विधिक जागरूकता सहायता विशेष अभियान विद्यालयों के किशोरों को लैंगिक अपराधों से बालकों का संरक्षण अधिनियम 2012 के विषय पर सरल और सही विधिक जानकारी देने के लिए जनपद न्यायाधीश सुशील कुमार शशि के निर्देशन और प्रभारी सचिव अतिरिक्त जिला एवं सत्र न्यायाधीश प्रशांत कुमार सिंह की देखरेख में राज इंटर कॉलेज जौनपुर में आयोजित किया गया। 
 इस अवसर पर विशेष जागरूकता सहायता अभियान की अध्यक्षता करते हुए अपर जिला एवं सत्र न्यायाधीश सुरेंद्र प्रसाद यादव  ने कहा कि संसद द्वारा लैंगिक अपराध से बालकों के संरक्षण के लिए विशेष अधिनियम 2012 बनाया गया है प्रत्येक 18 वर्ष से कम  बालक या बालिका को किसी भी प्रकार के यौन अपराध यौन आचरण या प्राकृतिक एवं अपराध से संरक्षण प्रदान किया गया है अज्ञानता के कारण कोई किशोर बालक और बालिका न कोई गंभीर अपराध करें न उसका शिकार बने उन्होंने बताया कि 18 वर्ष के नीचे के किशोर किशोरियों और बच्चों के प्रति किसी भी लैंगिक अपराध के लिए कठोर कानून है और इसमें पीड़ित प्रताड़ित के लिए विशेष सुविधा दिया गया है इन अपराधों की गंभीरता के आधार पर 3 वर्ष से लेकर आजीवन कारावास की सजा दी जाती है  और विशेष परिस्थितियों में यह मृत्युदंड तक विस्तृत हो सकती है। और 7 वर्ष तक के बच्चों के लिए गवाही देने का विशेष प्रावधान किया गया है इसके अतिरिक्त 7 से 12 वर्ष की आयु के अपराधी किशोरों के लिए भी विशेष व्यवस्था की गई है  और उनका परीक्षण  किशोर न्याय बोर्ड में किया जाता है उन्होंने किशोर बालक बालिकाओं को विशेष रूप से सजग रहने और अपराधों के प्रति माता-पिता और घर वालों को तत्काल सूचना देने के बारे में अवगत कराया । उन्होंने आगे बताया की सही मामलों पर तत्काल ही प्राथमिक की लिखने में परहेज नहीं करना चाहिए लेकिन अनावश्यक और गलत मामलों में शत्रुता के कारण किसी को गलत फंसाना भी नहीं चाहिए। किशोर बालक बालिकाओं को अपने माता-पिता और घर परिवार से ऐसी कोई भी बात नहीं छुपाना चाहिए जो इससे संबंधित हो। 

इस कार्यक्रम को संबोधित करते हुए डिप्टी चीफ डिफेंस काउंसिल जनपद न्यायालय जौनपुर डॉ दिलीप कुमार सिंह  ने गलत और सही स्पर्श के बारे में बताते हुए हेल्पलाइन नंबर 1090  1098 15100   112 नंबरों के बारे में बताया और कहा कि किसी का भी चित्र खींचने उसे अश्लील फोटो उसकी इच्छा के बिना दिखाना छेड़छाड़ करना पाक्सो अधिनियम के अंतर्गत आता है और जिला विधिक सेवा प्राधिकरण द्वारा निशुल्क सहायता और विधिक पैरवी की सुविधाओं के बारे में बताया और सोशल मीडिया पर सावधान रहने और साइबर क्राइम से बचने के बारे में विस्तार से बताते हुए अकेले और अलग स्थान पर जाने और अपरिचित लोगों से बचने की सलाह दिया उन्होंने यौन उत्पीड़न यौन अपराध यौन शोषण और अश्लीलता और पोर्नोग्राफी के बारे में सरल भाषा में विस्तार से समझाया। उन्होंने यह भी कहा कि यह अधिनियम 18 वर्ष से कम आयु के लड़के लड़कियों दोनों पर लागू होता है और इसमें पुलिस सादे कपड़ों में जाकर घर पर पीड़ित बच्चों का बयान लेती है  7 वर्ष से नीचे के बालकों को अपराधिकृत के लिए कोई सजा नहीं दी जाती जबकि साथ से 12 वर्ष के बालकों का परीक्षण किशोर न्याय बोर्ड में होता है 12 वर्ष के ऊपर के बालकों का परीक्षण यह मन कर किया जाता है कि उनके अंदर सही और गलत समझने की क्षमता है ।

प्रधानाचार्य  डॉ सुबाष चौबे एवं  डॉ अखिलेश्वर शुक्ला ने बालिकाओं को उचित कानूनी और पुलिस की सहायता लेने और परिवार से कुछ छुपाने की सलाह देते हुए आभार व्यक्त किया। इस अवसर पर उपस्थित हाई स्कूल और इंटरमीडिएट की छात्राओं द्वारा विभिन्न प्रश्न पूछे गए और जानकारी ली गई जिसका निराकरण अपर जिला जज सुरेंद्र प्रसाद  और डिप्टी चीफ डिफेंस काउंसिल डॉक्टर दिलीप कुमार सिंह  के द्वारा किया गया। संचालन डॉक्टर बृजभूषण यादव द्वारा किया गया। 

इस अवसर पर प्राधिकरण के  प्रकाश तिवारी असिस्टेंट अरविंद कुमार चौबे पैरा लीगल वालंटियर शिव शंकर सिंह प्रेमचंद विनय ओझा आनंद तिवारी अनिल कुमार यादव पूजा सिंह रंजना चौरसिया रंजन प्रजापति समस्त विद्यालय परिवार के समस्त शिक्षकगण और बड़ी संख्या में छात्र छात्राएं उपस्थित रही।

Tuesday, 29 September 2026

पाक्सो अधिनियम 2012 के तीन दिवसीय कार्यक्रम पर जागरूकता अभियान का दूसरा चरण संपन्न

प्रेस विज्ञप्ति

पाक्सो अधिनियम 2012 के तीन दिवसीय कार्यक्रम पर जागरूकता अभियान का दूसरा चरण संपन्न 

आज दिनांक 29/9/2026 को एक विधिक जागरूकता सहायता विशेष अभियान ** विद्यालयों के किशोरों को लैंगिक अपराधों से बालकों का संरक्षण अधिनियम 2012 के विषय पर सरल और सही जानकारी देने के लिए** जनपद न्यायाधीश सुशील कुमार शशि के निर्देशन और प्रभारी सचिव अतिरिक्त जिला एवं सत्र न्यायाधीश प्रशांत कुमार सिंह की देखरेख में बी आर पी इंटर कॉलेज जौनपुर  एवं मोहम्मद हसन इंटर कॉलेज जौनपुर में एक साथ  आयोजित किया गया। 

 इस अवसर पर विशेष जागरूकता सहायता अभियान की अध्यक्षता करते हुए अपर जिला एवं सत्र न्यायाधीश सुरेंद्र प्रसाद यादव एवं  उमेश कुमार ने कहा कि लैंगिक अपराध से बालकों के संरक्षण के लिए विशेष अधिनियम 2012 बनाया गया है प्रत्येक 18 वर्ष से कम  बालक या बालिका को किसी भी प्रकार के यौन अपराध यौन आचरण या प्राकृतिक एवं अपराध से संरक्षण प्रदान किया गया है अज्ञानता के कारण कोई किशोर बालक और बालिका न कोई गंभीर अपराध करें न उसका शिकार बने उन्होंने बताया कि 18 वर्ष के नीचे के किशोर किशोरियों और बच्चों के प्रति किसी भी लैंगिक अपराध के लिए कठोर कानून है और इसमें पीड़ित प्रताड़ित के लिए विशेष सुविधा दिया गया है इन अपराधों की गंभीरता के आधार पर 3 वर्ष से लेकर आजीवन कारावास की सजा दी जाती है  और विशेष परिस्थितियों में यह मृत्युदंड तक विस्तृत हो सकती है। और 7 वर्ष तक के बच्चों के लिए गवाही देने का विशेष प्रावधान किया गया है इसके अतिरिक्त 7 से 12 वर्ष की आयु के अपराधी किशोरों के लिए भी विशेष व्यवस्था की गई है  और उनका परीक्षण  किशोर न्याय बोर्ड में किया जाता है उन्होंने किशोर बालक बालिकाओं को विशेष रूप से सजग रहने और अपराधों के प्रति माता-पिता और घर वालों को तत्काल सूचना देने के बारे में अवगत कराया । उन्होंने आगे बताया की सही मामलों पर तत्काल ही प्राथमिक की लिखने में परहेज नहीं करना चाहिए लेकिन अनावश्यक और गलत मामलों में शत्रुता के कारण किसी को गलत फंसाना भी नहीं चाहिए। किशोर बालक बालिकाओं को अपने माता-पिता और घर परिवार से ऐसी कोई भी बात नहीं छुपाना चाहिए जो इससे संबंधित हो 
इस कार्यक्रम को संबोधित करते हुए डिप्टी चीफ डिफेंस काउंसिल जनपद न्यायालय जौनपुर डॉ दिलीप कुमार सिंह  एवं चीफ डिफेंस काउंसिल अनिल कुमार सिंह ने गलत और सही स्पर्श के बारे में बताते हुए हेल्पलाइन नंबर 1098 15100   112 नंबरों के बारे में बताएं और जिला विधिक सेवा प्राधिकरण द्वारा निशुल्क सहायता और विधिक पैरवी की सुविधाओं के बारे में बताया और सोशल मीडिया पर सावधान रहने और साइबर क्राइम से बचने के बारे में विस्तार से बताते हुए अकेले और अलग स्थान पर जाने और अपरिचित लोगों से बचने की सलाह दिया उन्होंने यौन उत्पीड़न यौन अपराध यौन शोषण और अश्लीलता और पोर्नोग्राफी के बारे में सरल भाषा में विस्तार से समझाया। उन्होंने यह भी कहा कि यह अधिनियम 18 वर्ष से कम आयु के लड़के लड़कियों दोनों पर लागू होता है और इसमें पुलिस सादे कपड़ों में जाकर घर पर पीड़ित बच्चों का बयान लेती है  7 वर्ष से नीचे के बालकों को अपराधिकृत के लिए कोई सजा नहीं दी जाती जबकि साथ से 12 वर्ष के बालकों का परीक्षण किशोर न्याय बोर्ड में होता है 12 वर्ष के ऊपर के बालकों का परीक्षण यह मन कर किया जाता है कि उनके अंदर सही और गलत समझने की क्षमता है 

प्रधानाचार्य एवं नसीर अहमद ने बालिकाओं को उचित कानूनी और पुलिस की सहायता लेने और परिवार से कुछ छुपाने की सलाह देते हुए आभार व्यक्त किया  और सम्मान चिन्ह अपर जिला जज सुरेंद्र प्रसाद यादव उमेश कुमार एवं डॉ दिलीप कुमार सिंह और अनिल कुमार सिंह कप्तान को दिया गया इस अवसर पर उपस्थित हाई स्कूल और इंटरमीडिएट की छात्राओं द्वारा विभिन्न प्रश्न पूछे गए और जानकारी ली गई जिसका निराकरण अपर जिला जज सुरेंद्र प्रसाद उमेश कुमार यादव और डिप्टी चीफ डिफेंस काउंसिल डॉक्टर दिलीप कुमार सिंह एवं अनिल कुमार सिंह के द्वारा किया गया। 

इस अवसर पर प्राधिकरण के  प्रकाश तिवारी असिस्टेंट लीगल एड डिफेंस काउंसिल अरविंद कुमार चौबे पैरा लीगल वालंटियर शिव शंकर सिंह सुनील कुमार गौतम अरुण कुमार  सुनील कुमार सुभाष यादव समस्त विद्यालय परिवार के समस्त शिक्षकगण और बड़ी संख्या में छात्र छात्राएं उपस्थित रही।

Monday, 28 September 2026

*नाम एसीआर का, गला जूनियर का—यूपी की बिजली फाइल से चलती है, खंभे से नहीं*

*नाम एसीआर का, गला जूनियर का—यूपी की बिजली फाइल से चलती है, खंभे से नहीं*

लखनऊ। शक्ति भवन का पोस्टर कहता है—मॉनिटरिंग जारी है। बारिश कहती है—खंभा गिर गया। दोनों के बीच दो फाइलें हैं। एक का नाम एसीआर है। दूसरी का नाम बजट है। पहली फाइल जुबान बंद करती है। दूसरी फाइल पूछती है—हजारों करोड़ गए, नेटवर्क कहां गया?
एसीआर यानी एनुअल कॉन्फिडेंशियल रिपोर्ट—वार्षिक गोपनीय रिपोर्ट। सरकारी सेवा में यही कागज अधिकारी का भविष्य लिखता है। प्रमोशन, अच्छी पोस्टिंग, अगली कुर्सी—सब इसी पर टिकते हैं। खराब रिपोर्ट लगे तो सालों कुर्सी पड़ी रह सकती है। अच्छी लगे तो रास्ता खुलता है। इसलिए सवाल सीधा है: जूनियर अपना एसीआर सीनियर से खराब करवाएगा?
ऊपर रणवीर प्रसाद हैं। 2000 बैच के आईएएस, प्रमुख सचिव ऊर्जा, अध्यक्ष यूपीपीसीएल। सेवा के पच्चीस-छब्बीस साल। उनके नीचे यूपीपीसीएल के प्रबंध निदेशक नितीश कुमार, 2010 बैच—लगभग दस साल जूनियर। फिर पाँच वितरण कंपनियाँ।
मध्यांचल के एमडी संदीप भागिया 2018 बैच—रणवीर से करीब अठारह साल छोटे। पूर्वांचल के एमडी संदीप कुमार 2014 बैच—चौदह साल छोटे। पश्चिमांचल के एमडी रवीश गुप्ता 2012 बैच—बारह साल छोटे। दक्षिणांचल की एमडी श्रुति 2011 बैच—ग्यारह साल छोटी। केस्को की एमडी नेहा जैन 2014 बैच—फिर चौदह साल छोटी।
हर साल वरिष्ठ अधिकारी कनिष्ठ के काम, आचरण और ‘निष्ठा’ पर गुप्त टिप्पणी लिखता है। अच्छी रिपोर्ट मिले तो स्केल बढ़े। खराब या ‘औसत’ लिख दी जाए तो फाइल अटके, तबादला सजा बने, जुबान बैठ जाए। बिजली के एमडी के हाथ में अभियंता हैं, संविदा कर्मी हैं, करोड़ों का ठेका है। अगर वही एमडी जानता है कि उसकी रिपोर्ट शक्ति भवन से गुजरेगी, तो वह वरिष्ठ के आदेश के खिलाफ कितना खड़ा होगा? नाम लेते ही गला बैठ जाए, तो तोता क्या बोलेगा? जूनियर अक्सर यहीं कांप जाते हैं। जान उनकी, दम सीनियर का।
इसी रेखा पर 2010 का लाइसेंस कागज पर डिस्कॉम के नाम है, हिम्मत अक्सर लखनऊ की कुर्सी की है। होल्डिंग कंपनी समन्वय के लिए होती है, स्वायत्तता छीनने के लिए नहीं। यहां होल्डिंग मुखौटा है। मुखौटे के पीछे केंद्रीय निविदा है, रबर स्टांप निदेशक हैं, और एसीआर की डोर है। निजी 51 प्रतिशत हिस्सेदारी में आईएएस यह मनमानी नहीं चला सकता। वहां कुर्सी और सजा एक घर में नहीं होती। यहां एक घर है।
तीन-चार दिन की बारिश ने यही घर दिखा दिया। 11 केवी के 716 फीडर, 33 केवी के 173 सब-स्टेशन, करीब 15 लाख उपभोक्ता। लखनऊ-हरदोई-बलिया के टूटे पोल और ट्रांसफार्मर। मांग 28–29 हजार मेगावाट से गिरकर 13–14 हजार पर आ गई। बिजली की कमी नहीं थी। कमी अनुरक्षण की थी, संविदा कर्मियों की थी। उन्नीस बारह हाँफने लगा। शिकायत दर्ज हुई, लाइन नहीं आई। विभाग बोला—निगरानी हो रही है। उपभोक्ता बोला—खंभा कहां है।
यहीं दूसरी फाइल खुलती है।
हजारों करोड़ गए। नेटवर्क कहां गया?
पिछले पाँच वर्षों में केंद्र की आरडीएसएस—रेवैंप्ड डिस्ट्रीब्यूशन सेक्टर स्कीम—अकेली योजना यूपी के लिए सबसे बड़ी थाली लेकर आई। संसद में बिजली मंत्रालय ने बताया—यूपी को करीब 40,739 करोड़ के प्रोजेक्ट मंजूर। इसमें स्मार्ट मीटरिंग करीब 18,956 करोड़, लॉस रिडक्शन इंफ्रा करीब 21,782 करोड़। केंद्र की ग्रॉस बजटीय सहायता करीब 16,570 करोड़ मंजूर बताई गई, जिसमें से करीब 7,028 करोड़ जारी और लगभग 6,989 करोड़ उपयोग बताए गए। राज्य की बिजनेस प्लान, ओ एंड एम और पुरानी डीडीयूजीजेवाई-आईपीडीएस जैसी योजनाएं इसमें अलग परत हैं।​
आंकड़ा छोटा नहीं है। सवाल छोटा और कठोर है: इतना पैसा अनुरक्षण और नए कामों के नाम पर आया, तो चार दिन की बारिश में सैकड़ों फीडर क्यों ढह गए? पैसा खाते में घुसा, खंभे में नहीं घुसा—यह निष्कर्ष जांच का विषय है। लेकिन उपभोक्ता को खाता नहीं चाहिए, लाइन चाहिए। लाइन नहीं आई, तो पैसा कहां गया—यह पूछना भ्रष्टाचार का नारा नहीं, हिसाब मांगना है।
सीएजी पहले भी यूपी के डिस्कॉम-यूपीपीसीएल ढांचे से चली केंद्र योजनाओं में फीडर पृथक्करण अधूरा रहने, ठेकेदारों को अतिरिक्त भुगतान जैसी गड़बड़ियां रेखांकित कर चुका है। यानी संदेह नया नहीं है। नया सिर्फ इतना है कि इस बार संदेह अंधेरे घर में बैठा है।
यूपीपीसीएल खुद थर्ड पार्टी बैठाता है—आरआईटीईएस, एनपीटीआई, ईआरडीए, क्यूसीआई। रिपोर्ट लगे, तब पेमेंट। तूफान ने एक वाक्य में पूछ लिया: मुहर साफ थी तो पोल क्यों गिरा? काम घटिया था तो क्लीन चिट किसने दी? ठेकेदार अकेला नहीं। फाइल चलाने वाला भी पूछा जाना चाहिए। और फाइल तब नहीं खुलती, जब लिखने वाला और चलाने वाला एक ही छत के नीचे हों। एसीआर उसी छत की चाबी है।
आलोचक बीएसएनएल वाली तैयारी देख रहे हैं। पहले निवेश दिखाओ, संस्था लंगड़ी करो, फिर कहो—निजी हाथ ही बचाएगा। पूर्वांचल-दक्षिणांचल सालों से थाली में हैं। घाटा एक सचाई है। दूसरी सचाई—केंद्रीकृत ठेका, अधूरी गैंग, मुहर वाली रिपोर्ट। निजीकरण खंभे को लोहा नहीं बनाता। कमजोर किसने किया, यह सवाल होल्डिंग के दफ्तर में अटक जाता है।
एसीआर अच्छी हो तो अधिकारी ‘टीम प्लेयर’ कहलाता है। खराब हो तो ‘असहयोगी’। बिजली में टीम प्लेयर का मतलब अक्सर यह निकलता है कि शक्ति भवन से आया ठेका बिना सवाल के चले। असहयोगी वह भी हो सकता है जो कह दे—अनुरक्षण के पैसे खंभे तक नहीं पहुंचे, संविदा कर्मी कम हैं, केंद्रीय टेंडर से काम नहीं संभलेगा। ऐसी बात रिपोर्ट में ‘नकारात्मक प्रवृत्ति’ बन सकती है। इसलिए डमरू ऊपर बजता है, गुलाटी नीचे बंटती है।
जूनियर एमडी काबिल भी हों—भागिया आईआईटी दिल्ली के इलेक्ट्रिकल हैं, संदीप कुमार आईआईटी कानपुर के मैकेनिकल—रेखा नहीं मिटती। रेखा यह है कि वार्षिक गोपनीय रिपोर्ट लिखने वाला और निविदा निकालने वाला एक ही तंत्र में बैठता है। स्वायत्तता तब झूठ हो जाती है। दीपक रायजादा वाली कॉर्पोरेट प्लानिंग आलोचकों के लिए उसी रीति की मिसाल है—तकनीकी कुर्सी, मनचाहा चेहरा।
अगर यह पूर्व तैयारी नहीं है, तो रास्ता साफ है। एमडी की रिपोर्ट मैदान से लिखो—कितने फीडर बचे, कितने कर्मी खेत में थे, कितना पैसा खंभे तक पहुंचा। टेंडर डिस्कॉम के खाते में उतारो। संविदा कर्मी पूरे करो। थर्ड पार्टी की मुहर पर कार्रवाई खोलो। नहीं तो अध्याय लिखा जाएगा: घाटा पाला, नेटवर्क गिराया, निजी थाली सजाई। बीएसएनएल पहला पाठ था। बिजली को दूसरा मत बनाओ।
अभी रात है। एसीआर बंद होगी। बजट की फाइल भी बंद होगी। कंट्रोल रूम जल रहा होगा। उन्नीस बारह हाँफ रहा होगा। याद रखने लायक बात दो ही हैं। एक—एसीआर यानी वार्षिक गोपनीय रिपोर्ट; अच्छी हो तो कुर्सी चमकती है, खराब हो तो जुबान बंद होती है। दो—हजारों करोड़ मंजूर हुए, जारी भी हुए, उपयोग भी बताए गए; फिर भी चार दिन की बारिश ने पूछ लिया—नेटवर्क कहां गया। जब तक दोनों फाइलें खंभे से न खुलें, बिजली फाइल से चलती रहेगी, घर अंधेरे से। खैर 

        *युद्ध अभी शेष है*


*अविजित आनन्द संपादक समय का उपभोक्ता राष्ट्रीय हिंदी साप्ताहिक समाचार पत्र लखनऊ और विस्पर आफ अन्टोल्ड हिन्दी अंग्रेजी मासिक पत्रिका साथ में चन्द्रशेखर सिंह प्रबंध संपादक समय का उपभोक्ता राष्ट्रीय हिंदी साप्ताहिक समाचार पत्र लखनऊ*