*नाम एसीआर का, गला जूनियर का—यूपी की बिजली फाइल से चलती है, खंभे से नहीं*
लखनऊ। शक्ति भवन का पोस्टर कहता है—मॉनिटरिंग जारी है। बारिश कहती है—खंभा गिर गया। दोनों के बीच दो फाइलें हैं। एक का नाम एसीआर है। दूसरी का नाम बजट है। पहली फाइल जुबान बंद करती है। दूसरी फाइल पूछती है—हजारों करोड़ गए, नेटवर्क कहां गया?
एसीआर यानी एनुअल कॉन्फिडेंशियल रिपोर्ट—वार्षिक गोपनीय रिपोर्ट। सरकारी सेवा में यही कागज अधिकारी का भविष्य लिखता है। प्रमोशन, अच्छी पोस्टिंग, अगली कुर्सी—सब इसी पर टिकते हैं। खराब रिपोर्ट लगे तो सालों कुर्सी पड़ी रह सकती है। अच्छी लगे तो रास्ता खुलता है। इसलिए सवाल सीधा है: जूनियर अपना एसीआर सीनियर से खराब करवाएगा?
ऊपर रणवीर प्रसाद हैं। 2000 बैच के आईएएस, प्रमुख सचिव ऊर्जा, अध्यक्ष यूपीपीसीएल। सेवा के पच्चीस-छब्बीस साल। उनके नीचे यूपीपीसीएल के प्रबंध निदेशक नितीश कुमार, 2010 बैच—लगभग दस साल जूनियर। फिर पाँच वितरण कंपनियाँ।
मध्यांचल के एमडी संदीप भागिया 2018 बैच—रणवीर से करीब अठारह साल छोटे। पूर्वांचल के एमडी संदीप कुमार 2014 बैच—चौदह साल छोटे। पश्चिमांचल के एमडी रवीश गुप्ता 2012 बैच—बारह साल छोटे। दक्षिणांचल की एमडी श्रुति 2011 बैच—ग्यारह साल छोटी। केस्को की एमडी नेहा जैन 2014 बैच—फिर चौदह साल छोटी।
हर साल वरिष्ठ अधिकारी कनिष्ठ के काम, आचरण और ‘निष्ठा’ पर गुप्त टिप्पणी लिखता है। अच्छी रिपोर्ट मिले तो स्केल बढ़े। खराब या ‘औसत’ लिख दी जाए तो फाइल अटके, तबादला सजा बने, जुबान बैठ जाए। बिजली के एमडी के हाथ में अभियंता हैं, संविदा कर्मी हैं, करोड़ों का ठेका है। अगर वही एमडी जानता है कि उसकी रिपोर्ट शक्ति भवन से गुजरेगी, तो वह वरिष्ठ के आदेश के खिलाफ कितना खड़ा होगा? नाम लेते ही गला बैठ जाए, तो तोता क्या बोलेगा? जूनियर अक्सर यहीं कांप जाते हैं। जान उनकी, दम सीनियर का।
इसी रेखा पर 2010 का लाइसेंस कागज पर डिस्कॉम के नाम है, हिम्मत अक्सर लखनऊ की कुर्सी की है। होल्डिंग कंपनी समन्वय के लिए होती है, स्वायत्तता छीनने के लिए नहीं। यहां होल्डिंग मुखौटा है। मुखौटे के पीछे केंद्रीय निविदा है, रबर स्टांप निदेशक हैं, और एसीआर की डोर है। निजी 51 प्रतिशत हिस्सेदारी में आईएएस यह मनमानी नहीं चला सकता। वहां कुर्सी और सजा एक घर में नहीं होती। यहां एक घर है।
तीन-चार दिन की बारिश ने यही घर दिखा दिया। 11 केवी के 716 फीडर, 33 केवी के 173 सब-स्टेशन, करीब 15 लाख उपभोक्ता। लखनऊ-हरदोई-बलिया के टूटे पोल और ट्रांसफार्मर। मांग 28–29 हजार मेगावाट से गिरकर 13–14 हजार पर आ गई। बिजली की कमी नहीं थी। कमी अनुरक्षण की थी, संविदा कर्मियों की थी। उन्नीस बारह हाँफने लगा। शिकायत दर्ज हुई, लाइन नहीं आई। विभाग बोला—निगरानी हो रही है। उपभोक्ता बोला—खंभा कहां है।
यहीं दूसरी फाइल खुलती है।
हजारों करोड़ गए। नेटवर्क कहां गया?
पिछले पाँच वर्षों में केंद्र की आरडीएसएस—रेवैंप्ड डिस्ट्रीब्यूशन सेक्टर स्कीम—अकेली योजना यूपी के लिए सबसे बड़ी थाली लेकर आई। संसद में बिजली मंत्रालय ने बताया—यूपी को करीब 40,739 करोड़ के प्रोजेक्ट मंजूर। इसमें स्मार्ट मीटरिंग करीब 18,956 करोड़, लॉस रिडक्शन इंफ्रा करीब 21,782 करोड़। केंद्र की ग्रॉस बजटीय सहायता करीब 16,570 करोड़ मंजूर बताई गई, जिसमें से करीब 7,028 करोड़ जारी और लगभग 6,989 करोड़ उपयोग बताए गए। राज्य की बिजनेस प्लान, ओ एंड एम और पुरानी डीडीयूजीजेवाई-आईपीडीएस जैसी योजनाएं इसमें अलग परत हैं।
आंकड़ा छोटा नहीं है। सवाल छोटा और कठोर है: इतना पैसा अनुरक्षण और नए कामों के नाम पर आया, तो चार दिन की बारिश में सैकड़ों फीडर क्यों ढह गए? पैसा खाते में घुसा, खंभे में नहीं घुसा—यह निष्कर्ष जांच का विषय है। लेकिन उपभोक्ता को खाता नहीं चाहिए, लाइन चाहिए। लाइन नहीं आई, तो पैसा कहां गया—यह पूछना भ्रष्टाचार का नारा नहीं, हिसाब मांगना है।
सीएजी पहले भी यूपी के डिस्कॉम-यूपीपीसीएल ढांचे से चली केंद्र योजनाओं में फीडर पृथक्करण अधूरा रहने, ठेकेदारों को अतिरिक्त भुगतान जैसी गड़बड़ियां रेखांकित कर चुका है। यानी संदेह नया नहीं है। नया सिर्फ इतना है कि इस बार संदेह अंधेरे घर में बैठा है।
यूपीपीसीएल खुद थर्ड पार्टी बैठाता है—आरआईटीईएस, एनपीटीआई, ईआरडीए, क्यूसीआई। रिपोर्ट लगे, तब पेमेंट। तूफान ने एक वाक्य में पूछ लिया: मुहर साफ थी तो पोल क्यों गिरा? काम घटिया था तो क्लीन चिट किसने दी? ठेकेदार अकेला नहीं। फाइल चलाने वाला भी पूछा जाना चाहिए। और फाइल तब नहीं खुलती, जब लिखने वाला और चलाने वाला एक ही छत के नीचे हों। एसीआर उसी छत की चाबी है।
आलोचक बीएसएनएल वाली तैयारी देख रहे हैं। पहले निवेश दिखाओ, संस्था लंगड़ी करो, फिर कहो—निजी हाथ ही बचाएगा। पूर्वांचल-दक्षिणांचल सालों से थाली में हैं। घाटा एक सचाई है। दूसरी सचाई—केंद्रीकृत ठेका, अधूरी गैंग, मुहर वाली रिपोर्ट। निजीकरण खंभे को लोहा नहीं बनाता। कमजोर किसने किया, यह सवाल होल्डिंग के दफ्तर में अटक जाता है।
एसीआर अच्छी हो तो अधिकारी ‘टीम प्लेयर’ कहलाता है। खराब हो तो ‘असहयोगी’। बिजली में टीम प्लेयर का मतलब अक्सर यह निकलता है कि शक्ति भवन से आया ठेका बिना सवाल के चले। असहयोगी वह भी हो सकता है जो कह दे—अनुरक्षण के पैसे खंभे तक नहीं पहुंचे, संविदा कर्मी कम हैं, केंद्रीय टेंडर से काम नहीं संभलेगा। ऐसी बात रिपोर्ट में ‘नकारात्मक प्रवृत्ति’ बन सकती है। इसलिए डमरू ऊपर बजता है, गुलाटी नीचे बंटती है।
जूनियर एमडी काबिल भी हों—भागिया आईआईटी दिल्ली के इलेक्ट्रिकल हैं, संदीप कुमार आईआईटी कानपुर के मैकेनिकल—रेखा नहीं मिटती। रेखा यह है कि वार्षिक गोपनीय रिपोर्ट लिखने वाला और निविदा निकालने वाला एक ही तंत्र में बैठता है। स्वायत्तता तब झूठ हो जाती है। दीपक रायजादा वाली कॉर्पोरेट प्लानिंग आलोचकों के लिए उसी रीति की मिसाल है—तकनीकी कुर्सी, मनचाहा चेहरा।
अगर यह पूर्व तैयारी नहीं है, तो रास्ता साफ है। एमडी की रिपोर्ट मैदान से लिखो—कितने फीडर बचे, कितने कर्मी खेत में थे, कितना पैसा खंभे तक पहुंचा। टेंडर डिस्कॉम के खाते में उतारो। संविदा कर्मी पूरे करो। थर्ड पार्टी की मुहर पर कार्रवाई खोलो। नहीं तो अध्याय लिखा जाएगा: घाटा पाला, नेटवर्क गिराया, निजी थाली सजाई। बीएसएनएल पहला पाठ था। बिजली को दूसरा मत बनाओ।
अभी रात है। एसीआर बंद होगी। बजट की फाइल भी बंद होगी। कंट्रोल रूम जल रहा होगा। उन्नीस बारह हाँफ रहा होगा। याद रखने लायक बात दो ही हैं। एक—एसीआर यानी वार्षिक गोपनीय रिपोर्ट; अच्छी हो तो कुर्सी चमकती है, खराब हो तो जुबान बंद होती है। दो—हजारों करोड़ मंजूर हुए, जारी भी हुए, उपयोग भी बताए गए; फिर भी चार दिन की बारिश ने पूछ लिया—नेटवर्क कहां गया। जब तक दोनों फाइलें खंभे से न खुलें, बिजली फाइल से चलती रहेगी, घर अंधेरे से। खैर
*युद्ध अभी शेष है*
*अविजित आनन्द संपादक समय का उपभोक्ता राष्ट्रीय हिंदी साप्ताहिक समाचार पत्र लखनऊ और विस्पर आफ अन्टोल्ड हिन्दी अंग्रेजी मासिक पत्रिका साथ में चन्द्रशेखर सिंह प्रबंध संपादक समय का उपभोक्ता राष्ट्रीय हिंदी साप्ताहिक समाचार पत्र लखनऊ*
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