Friday, 25 September 2026

: धर्म दर्शन विज्ञान और पितृविसर्जन का महापर्व -डॉ दिलीप कुमार सिंह मौसम विज्ञान ज्योतिष शिरोमणिप्रस्तावना

: धर्म दर्शन विज्ञान और पितृविसर्जन का महापर्व -डॉ दिलीप कुमार सिंह मौसम विज्ञान ज्योतिष शिरोमणि
प्रस्तावना 
अपने पूर्वजों पितरों के प्रति समर्पित इस बार का 16 दिनों का पितृपक्ष बहुत ही अद्भुत और अनूठा है बहुत वर्षों में एक दो बार ऐसा संजोग बनता है जब पितृपक्ष का आरंभ वर्षा से हो जो बहुत कम होता है  इसका अतिरिक्त इस वर्ष पितृपक्ष के आरंभ से ही ठंडा सुखद शीतल सुहाना मौसम है जो बहुत लंबे समय के बाद ही दिखता है अन्यथा शरद पूर्णिमा से ही ठंड का आरंभ होता है भादो महीने के कोख से ज्यादा निकलता है इस बार यह पूरी तरह सही हो रहा है 

पितृ विसर्जन के दिन क्या करें 

पितृ विसर्जन के दिन भी सामान्य रूप से वही सब किया जाता है जो इसके पहले 15 दिन में किया जाता है लेकिन इसमें एक अंतर है की दर्पण और श्राद्ध दोपहर की बेला में किया जाता है पिंडदान और श्रद्धा सुबह शाम नहीं किया जाता है लेकिन आपातकाल में ऐसा कर भी सकते हैं पितृपक्ष के दिन प्रतिदिन की भांति सुबह उठ कर नित्य क्रिया से निवृत्त होकर शुद्ध और शांत चित्र से स्नान करें इसके बाद प्रतिदिन की तरफ दक्षिण मुंह करके अपने पितरों को पानी गंगाजल दूध मिलकर उसमें अक्षत काला तिल और सफेद हल्के पीले पुष्प तथा कुश के साथ जलांजलि दें तत्पश्चात पिंडदान करें भजन को पिंड बनाकर पूर्वजों को अर्पित करने की क्रिया ही पिंडदान कहलाती है 

पंचबली और अन्य क्रियाएं 

इसके पश्चात भोजन जो श्राद्ध के निमित्त बना है उसको पांच प्राणियों में खिला देते हैं जिसमें गाय कुत्ता कौवा चींटी मछली या देवताओं के नाम पर निकाला गया भोजन होता है और इसी पांच लोगों के नाम पर इसे पंच बली कहा जाता है यह क्रिया संपन्न हो जाने पर पितरों को खीर और पूड़ी का भोग लगाया जाता है जो उन्हें अत्यंत प्रिय होता है फिर विद्वान सदाचारी सुपात्र व्यक्ति को भोजन कर कर अपने समर्थ के अनुसार दान दक्षिणा दे सकते हैं यह काम सबके लिए अनिवार्य नहीं है इच्छा अनुसार किया जा सकता है लेकिन आप पात्र व्यक्ति को भोजन और दक्षिण का दान नहीं करना चाहिए।

इसके पश्चात पीपल की पूजा करके उसमें जल देना चाहिए और दक्षिण दिशा में दीपक जलाना चाहिए विशेष श्राद्ध पूजा करने वालों को 16 बत्तियों वाले दीपक को जलाना चाहिए जो सरसों के तेल का होना चाहिए और यह दीपक दक्षिण दिशा में रखना चाहिए लेकिन यह नियम सबके लिए नहीं है यदि कोई श्रद्धा पूर्वक रोज की तरह तर्पण करके केवल गाय कुत्ते कौवे चींटी मछली को ही भोजन दे देता है तो वही पर्याप्त है। हमारे देवी देवता वैदिक रीति रिवाज के अनुसार शुद्ध विचार और अंतःकरण से अपनी पूजा से ही संतुष्ट हो जाते हैं बहुत अधिक पाखंड बढ़ने से लाभ की जगह हानि होती है जैसे आजकल विवाह संस्कार सहित हर शुभ और मांगलिक तथा दुख के कार्य में में हो रहा है।

पितृ विसर्जन के दिन क्या-क्या वर्जित है 

कुछ और बातों पर ध्यान पितृ विसर्जन के दिन रखना आवश्यक है इस दिन कोई भी नया कार्य शुरू न करें कोई भी शुभ और मांगलिक कार्य इस दिन करना मना है इसके साथ-साथ कम से काम पूरे दिन गलत आचरण या दूसरों की बुराई करना या किसी के साथ छल कपट करना भी पूरी तरह वर्जित है  यह दिन पितरों को खुशी के साथ विदाई देने का है और विदाई के दिन कोई भी नया काम वैसे भी नहीं किया जाता है सारे सारांश का मूल्य यही है क्योंकि विदाई के बाद व्यक्ति बाहर भीतर से पूरी तरह दुखी होता है ऐसे में शुभ मांगलिक और खुशी का काम वैसे भी नहीं किया जाता है पितर भी हमारे लिए जीवित व्यक्ति के समान है इसीलिए कोई भी नया काम या खुशी का काम इस दिन वर्जित किया जाता है इन 15 दिनों में चोरी बेईमानी झूठ अधूरा कर छल कपट विश्वास घाट जैसी चीज पूरी तरह वर्जित है जो हर एक पर्व त्यौहार पर वर्जित रहता है क्योंकि उन पितरों का दिन है जिन्होंने हमारे भविष्य के लिए अपना वर्तमान बलिदान किया है 

इस वर्ष कब से कब तक है पितृपक्ष

इस वर्ष रविवार 27 सितंबर से पितृपक्ष प्रथम दिन का प्रारंभ हो रहा है जो 10 अक्टूबर शनिवार के दिन समाप्त होगा इस प्रकार यह कालखंड 15 दिन का है इसमें पूर्णिमा तिथि को जोड़ देने पर यह 16 दिन का हो जाता है और पूर्णिमा की तिथि 26 सितंबर रविवार के दिन है पूर्णिमा के श्रद्धा से लेकर अमावस्या के श्राद्ध तक हर तिथि का विधि विधान ऊपर लेख में विस्तार से दिया गया है इतना अवश्य है की धरती के स्वर्ग अखंड कश्मीर से समुद्र के स्वर्ग कन्याकुमारी वर्षा और हरियाली के स्वर्ग आसाम चेरापूंजी की पहाड़ियों से शुष्कता वीरानी त्याग वीरता के स्वर्ग राजस्थान तक  फैले हुए दिव्य भारतवर्ष की पवित्र भूमि पर हम लोग पेड़ पौधे वृक्ष कंकड़ पत्थर पहाड़ नदी समुद्र के साथ पितरों की भी पूजा करते हैं और आज यह अटल ध्रुव वैज्ञानिक सत्य है कि ब्रह्मांड के कण-कण  में जीवन है और जिन पितरों की हम पूजा करते हैं उन्हीं के कारण आज हम जीवित हैं इसलिए आप केवल स्नान करके अपने पूर्वजों को याद करते हुए केवल जल ही दे दे वही उनके लिए पर्याप्त होगा और सनातन धर्म अखंड भारत के लिए बलिदान होने वाले पितरों को भी मेरी तरह तर्पण करें  तो और भी अच्छा रहेगा ।

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